सियासत
गोल्डन टेंपल गुरुद्वारा श्री हरमंदिर साहिब के प्रथम हेड ग्रंथि बाबा बुड्ढा जी साहब के जन्म दिवस पर महान कीर्तन दरबार
बाबा बुड्ढा जी: सिख धर्म के प्रथम महापुरुष
बाबा बुड्ढा जी सिख धर्म के प्रारंभिक और अत्यंत महत्वपूर्ण संतों में से एक थे, जिनका जीवन और कार्य सिख समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका जन्म 6 अक्टूबर 1506 को पंजाब के अमृतसर जिले के काठू नंगल गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम बुड़ा था, जो बाद में बाबा बुड्ढा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बुड्ढा नाम उन्हें गुरु नानक देव जी द्वारा दिया गया था, क्योंकि बचपन से ही उनमें गहरी आध्यात्मिक समझ और ज्ञान था, जो उनके उम्र से अधिक परिपक्व थी।
प्रारंभिक जीवन और गुरु नानक देव जी से मिलन
बाबा बुड्ढा जी का सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी से गहरा संबंध था। जब वे केवल 12 वर्ष के थे, तब उनकी मुलाकात गुरु नानक देव जी से हुई। गुरु नानक जी की शिक्षाओं ने उनके जीवन को नया आयाम दिया और उन्होंने अपने जीवन को पूरी तरह से गुरु सेवा और सिख धर्म की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। गुरु नानक देव जी ने उनकी आध्यात्मिक समझ को देखकर उन्हें बुड्ढा कहा, जिसका अर्थ होता है बुद्धिमान या ज्ञानी।
गुरु अंगद देव से गुरु अर्जन देव तक का योगदान
बाबा बुड्ढा जी ने सिख धर्म के पांच गुरुओं की सेवा की। उन्होंने गुरु नानक देव जी के बाद आने वाले चार गुरुओं के समय में सिख धर्म को मजबूती से स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुरु अंगद देव जी, गुरु अमर दास जी, गुरु राम दास जी और गुरु अर्जन देव जी के साथ उन्होंने कई महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक कार्यों में सहयोग किया।
बाबा बुड्ढा जी ने सिखों के प्रमुख धार्मिक समारोहों का नेतृत्व किया। वे गुरु गद्दी (गुरु की पदवी) के अनुष्ठान के दौरान गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु अर्जन देव जी तक के गुरु बनने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। सिख धर्म के इस महत्वपूर्ण अनुष्ठान में उनकी भूमिका अत्यंत सम्माननीय मानी जाती है।
अमृतसर और हरमंदिर साहिब की स्थापना
गुरु राम दास जी के समय में जब अमृतसर शहर की स्थापना की गई, तब बाबा बुड्ढा जी ने इस शहर के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की नींव रखने वाले प्रथम व्यक्ति भी थे। उन्होंने सिख धर्म के केंद्र के रूप में अमृतसर को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बाबा बुड्ढा जी का प्रभाव और विरासत
बाबा बुड्ढा जी का जीवन सिख धर्म के मूल्यों जैसे सेवा, समर्पण, और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। उनका सिख समुदाय में अत्यधिक सम्मान किया जाता है और उनकी शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। वे गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु अर्जन देव जी तक के मार्गदर्शक बने रहे, और उनकी सिख धर्म की प्रगति में अहम भूमिका रही।
1621 में 115 वर्ष की उम्र में बाबा बुड्ढा जी का निधन हुआ। उनकी स्मृति में पंजाब में कई गुरुद्वारे और धार्मिक स्थलों का निर्माण किया गया है, जहाँ श्रद्धालु आज भी उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करते हैं। बाबा बुड्ढा जी सिख इतिहास के एक अद्वितीय व्यक्तित्व थे, जिनका जीवन और कार्य हमेशा सिख धर्म और समाज के लिए प्रेरणादायक रहेगा।
