देश विदेश

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निर्देश पर सौर ऊर्जा स्ट्रीट लाइट से गांव-गांव रोशन।

जशपुर जंक्शन 23 दिसंबर 2025 

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निर्देशानुसार ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा आधारित स्ट्रीट लाइट लगाने का कार्य तेज़ी से किया जा रहा है। इस पहल से गांव-गांव रोशन हो रहे हैं और हर गली व हर मोहल्ला प्रकाश से जगमगा उठा है। सौर स्ट्रीट लाइटों से न केवल गांवों की तस्वीर बदली है, बल्कि ग्रामीण जीवन भी अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक हुआ है।

फरसाबहार ब्लॉक के ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय में सुरक्षा की दृष्टि से गांवों में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था किए जाने की मांग की थी। ग्रामीणों की इस मांग को गंभीरता से लेते हुए कैंप कार्यालय की पहल पर सौर ऊर्जा आधारित स्ट्रीट लाइट लगाने की कार्ययोजना तैयार की गई और इसका प्रभावी क्रियान्वयन किया गया।

फरसाबहार ब्लॉक के अंतर्गत ग्राम फरसाबहार, खुटगांव, बनगांव, हेटघिंचा, गारीघाट एवं भगोरा सहित अन्य गांवों में सौर स्ट्रीट लाइट की स्थापना से स्थानीय नागरिकों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। पहले जहां अंधेरे के कारण रात के समय आवागमन में कठिनाइयां होती थीं, अब पर्याप्त रोशनी से ग्रामीणों को सुरक्षित वातावरण मिल रहा है। महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे भी बिना भय के रात में बाहर निकल पा रहे हैं।

स्ट्रीट लाइट लगने से हाथी प्रभावित क्षेत्रों में भी सुरक्षा बढ़ी है। रात के समय पर्याप्त प्रकाश उपलब्ध होने से सतर्कता बढ़ी है और मानव–हाथी संघर्ष की घटनाओं में कमी आई है। ग्रामीणों को हाथियों की गतिविधियों का समय रहते आभास हो जाता है, जिससे जान–माल की सुरक्षा सुनिश्चित हो रही है।

सौर ऊर्जा से संचालित होने के कारण यह पहल पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा दे रही है। स्वच्छ, हरित और सतत ऊर्जा के उपयोग की दिशा में यह एक सशक्त कदम है। ग्रामीणों ने इस जनहितकारी पहल के लिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सौर स्ट्रीट लाइटों से उनके गांवों में सुरक्षा, सुविधा और विकास की नई रोशनी आई है, जिससे दैनिक जीवन अधिक सहज और सुरक्षित हुआ है।

प्रदेश

खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के बाद सामुदायिक पावर हाउस के रूप में जाने जाएंगे सिद्दी पहलवान।

 

 

 'प्रतिभा को किसी परिचय की जरूरत नहीं होती'- यह कहावत 'खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स- 2026' में सच साबित हुई, जहां कर्नाटक के 'सिद्दी समुदाय' के पहलवानों ने मैट पर अपनी जबरदस्त छाप छोड़ी है। उनकी यह सफलता अब सिर्फ़ पदकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समुदाय के कुश्ती के क्षेत्र में एक ताकत के तौर पर उभरने का प्रतीक है। अफ़्रीकी मूल के भारत में लगभग 50,000 सिद्दी लोग रहते हैं, जिनमें से एक-तिहाई कर्नाटक में निवास करते हैं।

 खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 में कर्नाटक के 9 पहलवानों ने हिस्सा लिया, जिनमें से 4 सिद्दी समुदाय से थे। इन चार पहलवानों में से तीन ने स्वर्ण पदक अपने नाम किया जबकि एक को रजत पदक मिला। स्वर्ण पदक जीतने वाले पहलवानों में मनीषा जुआवा सिद्दी (76 किग्रा), रोहन एम डोड़ामणि (ग्रीको रोमन 60 किग्रा) और प्रिंसिता पेदरू फर्नांडिस सिद्दी (68 किग्रा) शामिल हैं जबकि शालिना सेयर सिद्दी (57 किग्रा) को रजत पदक से संतोष करना पड़ा।

 इन पहलवानों की सफलता न सिर्फ उनके संघर्ष और मेहनत की कहानी कहती है, बल्कि कुश्ती जैसे खेलो में सिद्दी समुदाय के बढ़ते वर्चस्व को भी दिखाता है। कर्नाटक के इन चारों पहलवानों का दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में ट्रायल हुआ था और वहां भी ये पहले नंबर पर रहे थे। 

सिद्दी समुदाय के प्रदर्शन से कर्नाटक कुश्ती टीम की कोच ममता बेहद गौरवान्वित महसूस कर रही हैं।

ममता ने कहा, ''जैसे हमारे देश में कुश्ती में हरियाणा का दबदबा है तो ठीक वैसे ही हमारे राज्य में अहलियाल क्षेत्र का कुश्ती में वर्चस्व रहता है। राज्य में डिपार्टमेंट ऑफ यूथ एंड डेवलपमेंट एंड सेंटर मुख्य रूप से इन्हीं सिद्दी समुदाय के लिए है। इनके बच्चे यहीं पर ट्रेनिंग करते हैं। पिछले कुछ समय से इस समुदाय के लोगों के अंदर कुश्ती का क्रेज बढ़ा है और वे अब अपने बच्चों को कुश्ती में भेजने लगे हैं।

उत्तरी कर्नाटक के धारवाड़ जिले से आने वाले पुरुष पहलवान रोहन एम. डोड़ामणि भी इसी समुदाय से आते हैं। डोड़ामणि की मां सरकारी स्कूल में खाना पकाती हैं जबकि पिता का छह साल पहले ही देहांत हो चुका है।

 रोहन ने कहा, “सिद्दी समुदाय के अंदर समय-समय पर छोटे दंगल होते रहते हैं और जो इनमें जीतता है, उन्हें ज्यादा से ज्यादा पुरस्कार राशि देकर सम्मानित किया जाता है। खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 में स्वर्ण जीतने से पहले मैं सीनियर नेशनल चैंपियनशिप, नेशनल गेम्स और ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स में भी भाग ले चुका हूं।''

देश में खिलाड़ियों के अंदर छिपी प्रतिभा की पहचान करने और उन्हें एक बेहतर मंच देने के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) और खेल मंत्रालय ने मिलकर 2018 में खेलो इंडिया यूथ गेम्स की शुरुआत की थी। उसके बाद खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स और अब खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स की शुरुआत हुई है। 

साई के टैलेंट डेवलपमेंट कमेटी के सदस्य महा सिंह राव कहते हैं, '' साई और खेल मंत्रालय की तरफ से हम कम उम्र के प्रतिभाशाली बच्चों की पहचान करते हैं ताकि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का जो सपना है कि 2036 ओलंपिक खेल भारत में हो, उस सपने को साकार करने के लिए ये सरकार की रणनीति का एक हिस्सा है। प्रधानमंत्री के अलावा खेल मंत्री, साई और हम इस सपने को साकार करने में लगे हुए हैं कि आगे आने वाले ओलंपिक खेलों में हम ज्यादा से ज्यादा मेडल जीते।''

उत्तर कन्नड़ कारवार जिले से आने वाली शालिना सेयर सिद्दी ने इस प्रतियोगिता में रजत पदक जीतने के बाद कहा, ''हमारे समुदाय में कुश्ती को लेकर अब लोग दिलचस्पी लेने लगे हैं। मैंने अपने अंकल के कहने पर कुश्ती शुरू की थी और शुरू से ही वह मुझे ट्रेनिंग देते आ रहे हैं। मैंने इस प्रतियोगिता के लिए मेहनत तो पूरी की थी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और मैं स्वर्ण जीतने से चूक गई।'' 

कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ कारवार जिले से ही आने वाली प्रिंसिता सिद्दी ने कहा, ''शुरुआत में मुझे कुश्ती में दिलचस्पी नहीं थी और मैं बहुत रोई थी। लेकिन फिर धीरे-धीरे जब हमारे समुदाय के बच्चे इसमें भाग लेने लगे तो उन्हें देखकर मैं भी प्रैक्टिस करने लगी। यहां तक पहुंचने के लिए मैं शाम-सुबह दो-दो घंटे प्रैक्टिस करती हूं। मुझे इंटरनेशनल लेवल पर मेडल लाना है और इसके लिए मैं कड़ी मेहनत कर रही हूं।''

इन पहलवानों की सफलता इस बात को सिद्ध करती है कि जब सही मंच, ट्रेनिंग और सपोर्ट मिलता है, तो दूरदराज के समुदायों से भी प्रतिभाएं शिखर तक पहुंच सकती हैं और भारत के खेल भविष्य को आकार दे सकती हैं।